Saturday, 17 December 2011


 इतना क्यों बेकल है भाई
हर मुश्किल का हल है भाई

सूखा नहीं अभी भी सारा
कुछ आँखों में जल है भाई

आँख भले ही टिकी गगन पर
पैरों नीचे थल है भाई

यहाँ ठोस ही जी पाऐगा
जीवन भले तरल है भाई

कहाँ सूद की बात करें अब
डूबा हुआ असल है भाई

वही जटिल होता है सबसे
कहना जिसे सरल है भाई

आप भले ही ना माने पर
हमने कही ग़ज़ल है भाई

Wednesday, 7 December 2011

मेरे लहू की आग




सारे जग की प्यास बुझाना, इतना आसाँ काम है क्या?
पानी को भी भाप में ढलकर बादल बनना पड़ता है

जलते दिए की लौ ही जाने उसकी आँखें जानें क्या?
कैसी कैसी झेल के बिपता , काजल बनना पड़ता है

'मीर' कोई था 'मीरा' कोई, लेकिन उनकी बात अलग
इश्क न करना, इश्क में प्यारे पागल बनना पड़ता है

'निश्तर' साहब! हमसे पूछो, हमने जर्बें झेली हैं
घायल मन की पीड़ समझने घायल बनना पड़ता है
ज़र्बें :चोटें

Sunday, 9 October 2011

आख़िरी  कोशिश  भी   कर के  देखते
फिर  उसी   दर से  गुज़र  के  देखते


गुफ़्तगू  का  कोई  तो  मिलता  सिरा
फिर   उसे   नाराज़  कर  के   देखते
काश  जुड़   जाता  वो  टूटा   आईना
हम भी कुछ दिन बन संवर के देखते
रास्ते  को  ही  ठिकाना  कर   लिया
कब  तलक  हम ख़्वाब घर के देखते
काश  मिल जाता  कहीं  साहिल कोई
हम  भी  कश्ती से  उतर  के  देखते
हो  गया   तारी   संवरने   का  नशा
वरना  ख्वाहिश  थी  बिखर के  देखते
दर्द  ही गर  हासिल ए हस्ती  है तो
दर्द  की  हद  से   गुज़र  के   देखते

Monday, 3 October 2011

प्रेम काव्य - पर मैंने इसको, गीता ओ कुरान कहा है

प्रेम को किसी ने, भगवान कहा है,
और किसी ने इसे रब का, वरदान कहा है,
तुने इसे क्या समझा, नही जानता हूँ मैं,
मैंने इसे ईश्वरीय, तोहफा महान कहा है...........

किसी ने इसको, शीरी फरहाद है माना,
किसी ने इसको, लैला और मजनू मै जाना,
जिसने इसे जिस रूप मैं, देखा हुआ वैसा,
मैंने तो इसको अपना, हिंदुस्तान कहा है .............

किसी ने इसको कहा, राधा की भक्ति,

किसी ने माना इसे, सावित्री की शक्ति,
कुछ को लगे ये, जीसस और मदर टेरेसा,
पर मैंने इसको, गीता ओ कुरान कहा है .............

कुछ मर मिटे गोरी गोरी, चमड़ी देख के,
कुछ ने प्यार किया, बेपनाह दमड़ी देख के,
कुछ की नजर में प्यार है, बस पाना ही पाना,
मैंने तो इसको, त्याग और बलिदान कहा है ........

कुछ ने इसको चाहा, तलवार से पाना,
कुछ किये इसके लिए, तमाम साजिस ए जमाना,
पर प्यार है पूजा, इबादत मेरे साथी,
मैंने तो इसको, धर्म ओ ईमान कहा है ........

.....बहुत दिन बीते.......

थाली मैं दाल को आये हुए,
पत्नी को हरी सब्जी बनाये हुए,
खाने मै सलाद को खाए हुए,
......बहुत दिन बीते.......

रोटी का साथ देखो मक्खन ने छोड़ा,
दूध की खातिर बिटिया का दिल तोडा,
रोटी पे मक्खन लगाये हुए,
बिटिया को दूध पिलाये हुए, 
साथ मैं बिस्कुट खिलाये हुए,
......बहुत दिन बीते.......

बच्चों को दिलाने गये जो कपड़े,
महगाई ने हाथ दोनों ही पकड़े,
प्रेरणा को फ्राक दिलाये हुए,
पारस को अचकन सिलाये हुए,
नंगे पैरों को जूते पहनाये हुए,
......बहुत दिन बीते.......

दोस्तों को हमसे शिकायत ये आम है,
मिलते नही प्यारे क्या इतना काम है,
दोस्तों को घर पर बुलाये हुए,
दोस्तों के घर खुद भी जाये हुए,
मिल जुल के पार्टी मनाये हुए,
......बहुत दिन बीते.......

त्योहारों की रंगत अब हो गई फीकी,
महगाई से हमने बात ये है सीखी,
ईद की सिवैयां खाए हुए,
दिवाली की मिठाई भिजवाये हुए,
किरिश्मश पे गिफ्ट दिलाये हुए,
.....बहुत दिन बीते.......

मैं जब तक नेताओं की बात नही कर लेता मेरे पेट का दर्द ठीक नही होता है (
ऐसा नही की सारे नेता ही खराब हैं मगर बहुतायत तो भ्रष्ट व अपराधिक टाइप के
नेताओं का ही है ) सो उन भ्रष्ट नेताओं के लिए कुछ पंक्तियाँ..........

हम करते हैं जब भी दिखावा ही करते,
देश की हालत से फर्क हमको नही पड़ते,
गणतन्त्र दिल से मनाये हुए,
राष्ट्र गान वास्तव मैं गाये हुए,
दिल से तिरंगा फहराए हुए,
......बहुत दिन बीते.......
तड़प से जाते हैं हम, रूठ कर यूँ जाया न करो
ऐ सितमगर रोते हुओं को और रुलाया न करो

जाना हीं  हो तुम्हे,  तो जाओ  कुछ  इस  तरह
ले जाओ निशानियाँ, यादों में भी आया न करो

हमे  सुनाकर  बेवफाइयों  के किस्से  बार बार
हमारे सब्र की  इन्तेहाँ  को आजमाया न करो

न आता  हो तुम्हे  निभाना, तो रिश्ते बनाकर

कसमों  वादों में  किसी को  उलझाया  न करो

हँसा कर एक बार यूँ  बार बार रुला देते हों हमें
अब रहने दो तन्हा, महफ़िलों में बुलाया न करो

Saturday, 1 October 2011

कितना हालात ने लाचार किया है मुझको,
पोंछ सकता नहीं आँखों से तुम्हारे आंसू.
मैं यह सह लेता,अगर हाथ किसी का बढ़ता,
देख सकता नहीं दिन रात ये बहते आंसू.


गर मिला होता कोई कांधा तुम्हें रोने को,
फेर कर नज़रें, मैं हट जाता तेरी राहों से.
होता बस में मेरे, दे देता उजाले अपने,
सर्द रातों को तपा देता,  मेरी साँसों से.


अब न रिश्ता, न कोई हक़ है करीब आने का,

सिर्फ अहसास का अनजान सा है एक नाता.
ज़िस्म के रिश्ते छुपे रहते हैं चादर में यहाँ,
सिर्फ ज़ज्बात का रिश्ता ही है पत्थर खाता.


कह  नहीं सकता कि अब आओ कहीं दूर चलें,
जब ज़मीं अपनी नहीं, आसमां क्यों कर होगा.
बंद खिड़की ये करो, हसरतें जगती  दिल में,
खुश्क हैं आँख, मगर दिल भी न क्या तर होगा.

Monday, 26 September 2011

देवता हमें पुकारेंगे..''

''जब पाप या प्रेम करने की बची न होगी शक्ति,
जब एक लहूलुहान भाषा और जर्जर शरीर भर होंगे पास,
जब शब्द उड़ रहे होंगे चिंदियों की तरह हवा में
तब किसी पुराने छज्जे से
स्वप्न की किसी ऊंची चट्टान से
सदियों से बंद किसी खिड़की से
देवता हमें पुकारेंगे..''

Thursday, 22 September 2011

हुक्म चलता है तेरा तेरी ही सरदारी है

हुक्म चलता है तेरा तेरी ही सरदारी है
तू है पैसा, तू ख़ुदा, तेरी वफ़ादारी है।

नंगापन भी तो यहाँ फ़न की तरह बिकता है
अब तो जिस्मों की नुमाईश ही अदाकारी है।

कट गया दिन तो मेरा भीड़ में जैसे-तैसे
लेकिन अब चाँद बिना रात बहुत भारी है।

गौर से देख जरा बीज से अंकुर फ़ूटा
ये ख़ुदा है ये उसी की ही ख़लक सारी है।

छोड़ दो जिद न करो हार चुके हो अब तुम
अब कोई दांव न खेलो तो समझदारी है। 

Monday, 19 September 2011

BAAT PHOOLO'N KI

Phir Chhidi Raat Baat Phoolo'n Ki
raat hai yaa baaraat phoolo'n kii

phool ke hai.n phool ke gajare

shaam phoolo'n kii, raat phoolo'n kii
aapkaa saath-saath phoolo'n kaa
aapkii baat baat phoolo'n kii

phl khilate rahe'nge duniyaa mein

roz nikalegii baat phoolo'n kii

nazare.n milatii hai.n jaam milate hai.n

mil rahii hai hayaat phuulo.n kii

ye mahakatii huii Gazal maKaduu.n

jaise saharaa me.n raat phuulo.n kii

घूरता कया है कमीने कुत्ते
सुंघता कया है कमीने कुत्ते.

चांदनी ओढ् सो गई बस्ती
जागता कया है कमीने कुत्ते.

शबकी खामोशी सुन सके सुन
भुंकता कया है कमीने कुत्ते.

ये तो तेरी ही अपनी हड्डी है
चातटा कया है कमीने कुत्ते.

गेर अक़स आईने में कहां
नौचता कया है कमीने कुत्ते.

तेरे सायेका तुझ पे पांव पडा
काटता कया है कमीने कुत्ते.

तेरी मंझील हनोझ कोसों दूर
हांपता कया है कमीने कुत्ते.

सामना कर तमाम दुनिया का
भाकता कया है कमीने कुत्ते.

सोचने का कोइ इलाज नहीं
सोचता कया है कमीने कुत्ते.

देख सारी खुदाई जाग उठी
उंघता कया है कमीने कुत्ते.

वो मेरा अपना था यूँ तो
फिर भी इक सपना था यूँ तो
सारी बातें नजरों ने की
मुँह से भी कहना था यूँ तो
उनका घर गैरों का कब्जा
दोनों को रहना था यूँ तो
उसने सब कुछ दिखला डाला कुछ ना कुछ पहना था यूँ तो
रंजिश थी पर सबके आगे
अपनापन लगना था यूँ तो
तन का इक इक तार बिखेरा रिश्ता भी बुनना था यूँ तो
सहरा में छालों से पानी
बादल से मिलना था यूँ तो ।

Sunday, 18 September 2011

सुन लो जो सय्याद करेगा 
वो मुझको आजाद करेगा 

आँखों ने ही कह डाला है 
तू जो कुछ इरशाद करेगा 

एक जमाना भूला मुझको 
एक जमाना याद करेगा 

काम अभी कुछ ऐसे भी हैं 
जो तू अपने बाद करेगा 

तुझको बिलकुल भूल गया हूँ 
जा तू भी क्या याद करेगा 

मुझको जब ऊँचाई दे 
मुझको जमीं दिखाई दे 

एक सदा ऐसी भी हो 
मुझको साफ सुनाई दे 

दूर रहूँ मैं खुद से भी 
मुझको वो तनहाई दे 

एक खुदी भी मुझमें हो 
मुझको अगर खुदाई दे 

hai to hai

अग्नि- वर्षा है तो है ,हाँ !बर्फबारी है तो है 
मौसमों के दरमियाँ एक जंग जारी है तो है 

जिन्दगी का लम्हा -लम्हा उसपे भारी है तो है 
क्रन्तिकारी व्यक्ति ,कुछ हो ,क्रन्तिकारी है तो है 

मूर्ति सोने की निरर्थक वस्तु है ,उसके लिए ,
मोम की गुड़िया अगर बच्चे को प्यारी है तो है 

खू -पसीना एक करके हम सजाते हैं इसे 
हम अगर कह दें कि यह दुनियाँ हमारी है तो है 

रात कोठे पर बिताता है कि होटल में कोई 
रोशनी में दिन की ,मंदिर का पुजारी है तो है 

अपनी कोमल भावना के रक्त में डूबी हुई 
मात्र श्रद्धा 'आज भी भारत की नारी है तो है 

हैं तो हैं दुनियां से बे परवा परिंदे शाख पर 
घात से उनकी कहीं कोई शिकारी है तो है 

आप छल - बल के धनी हैं जीतियेगा आप ही 
आप से बेहतर मेरी उम्मीदवारी है तो है 

देश की सम्पन्नता कितनी बढ़ी है देखिए 
सोचिए क्यों ?देश की जनता भिखारी है तो है 

दिल्लियों ,अमृतसरों की भीड़ में खोयी हुई ,
देश में अपने कहीं कन्याकुमारी है तो है 

एहतराम अपने गज़ल लेखन को कहता है कला 
आप कहते हैं उसे जादूनिगारी है ,तो है
हमारे ख़्वाब की दुनियां ,हमारी आस की दुनिया
चुरा सकता नहीं हमसे कोई एहसास की दुनिया 

गमों पर मुस्कराती है खुशी पर खुश नहीं होती 
समझ में ही नहीं आती हमारे पास की दुनिया 

बनाने में लगे बरसों मिटाने में लगे पल भर 
अजब ही शै हुआ करती है ये विश्वास की दुनिया 

कई सच पूर्व जन्मों के कई सच बाद के होंगे 
हमारा सच मगर है यह हमारी श्वास की दुनिया

न कम होती है पीने से न प्यासा ही रहा जाए 
जहां भी है वहीं पर है मुसलसल प्यास की दुनिया


मौसम से हरियाली गायब 
जीवन से खुशहाली गायब 

ईयरफ़ोन हुआ है गहना 
अब कानों से बाली गायब 

ईद खुशी की आये कैसे 
होली गुम दीवाली गायब 

उतरा है आँखों का पानी 
औ चेहरे  की लाली गायब 

अफ़वाहों के  बम जिन्दा हैं  
बातें भोली -भाली गायब 

मीठापन भी ज़हर हुआ है 
वो मिश्री सी गाली गायब 

रातों का सन्नाटा पसरा 
दिन की रुत मतवाली गायब

Saturday, 17 September 2011

Bhukh Insaan ko Gaddar bana deti hai

Tan ki agan mann ko gunaahgar bana deti hai
baag ke baag ko bekar bana deti hai
ae bhuke pet ko desh-bhakti sikhane walo'n
Bhukh Insaan ko Gaddar bana deti hai

Wednesday, 14 September 2011

taaro'n bhari raat

zindagi  taaro'n bhari yah raat hai.
zindagi  kirno'n-dhula prabhat hai.
lalak jine ki agar is saans mein,
zindagi  phulo'n saji baarat hai..

Tuesday, 13 September 2011

Jaagte rahiye

Jaagte rahiye, zamaane ko Jagaate rahiye,

Meri aawaaz se aawaaz milaate rahiye.


Neend aati hai to takdir bhi so jaati hai,

Koi ab so na sake, geet wo gaate rahiye.