Sunday, 9 November 2014

टी0 वी0 से अख़बार तक ग़र सेक्स की बौछार हो

टी0 वी0 से अख़बार तक ग़र सेक्स की बौछार हो फिर बताओ कैसे अपनी सोच का विस्तार हो बह गए कितने सिकन्दर वक्त के सैलाब में अक्ल इस कच्चे घड़े से कैसे दरिया पार हो सभ्यता ने मौत से डरकर उठाए हैं क़दम ताज़ की कारीगरी या चीन की दीवार हो मेरी खुद्दारी ने अपना सर झुकाया दो जगह वो कोई मजलूम हो या साहिबे किरदार हो एक सपना है जिसे साकार करना है तुम्हें झोपड़ी से राजपथ का रास्ता हमवार हो

मै बेवफा हु उसने ये तो बता दिया,

मै बेवफा हु उसने ये तो बता दिया,पर मेरी वफाओ का उसने क्या सिला दिया,
वादा करके जिंदगी भर के साथ का,नये दोस्त बना के मुझको भुला दिया,
मुझे काफ़िर बता के गैरों संग मुस्कुराए,गलती हमारी नाखुदा को खुदा बना दिया,
चलो माना मै कभी तेरे काबिल ही नही था,ये जानते हुए भी साथ तुमने सालो बिता दिया,
मै जज्बातो के शतरंज का खिलाड़ी सनम,तुझमे कुछ तो बात थी जो मुझको रुला दिया ....गौरव


ना शाख़ों ने जगह दी ना हवाओ ने बक़शा,

वो पत्ता आवारा ना बनता तो क्या करता . . . .गौरव




na shakho ne jagah di na hawao ne baqsha,


vo patta awara na banta to kya karta . . . . .gaurav





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तेरा सपना क्यों पूरा नहीं होता

तेरा सपना क्यों पूरा नहीं होता…..
हिम्मत वालो का इरादा अधुरा नहीं होता,
जिस इंसान के कर्म अच्छे होते है
उस के जीवन में कभी अँधेरा नहीं होता..!!

Sunday, 6 July 2014

शेर जो गजल न बन सके - जिन्दगी

कुछ दूर यूंही चल कर अक्सर ठहर जाती है जिन्दगी
फ़िर हर इक याद  रुक रुक कर दोहराती है जिन्दगी
पहले तो ढूंढती है अपने यह लिये खुद इक मुकाम
और फ़िर खुद ही इक तलाश बन जाती है जिन्दगी

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कांच से रिश्ते संभालने में बिताई है जिन्दगी
फ़िर आज क्यूं हमसे हुई परायी है जिन्दगी
ख्वाबों के शहर छोड कर हम हैं दूर आ गये
हालात की आंधी में रेत  सी उडाई है जिन्दगी

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यूं जीने का नाम जिन्दगी है सोचा न था कभी
बस रोने का नाम जिन्दगी है सोचा न था कभी
वफ़ा के नाम पर वो सिर्फ़ इक दाग   दे गया
उदास सुबह शाम जिन्दगी है सोचा न था कभी

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हर पल कुछ नया रूप  दिखलाती है जिन्दगी
कभी धूप कभी चांदनी में चलाती है जिन्दगी
कभी मखमल बन तलबे सहलाती है जिन्दगी
कभी खार बन गहरे तक गढ जाती है जिन्दगी

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              copied from   mohinder kumar's blog <dil ka darpan>

Wednesday, 23 May 2012

dohe nida fazali ke

सबकी पूजा एक सी ,अलग -अलग हर रीत 
मस्जिद जाए मौलवी ,कोयल गाए गीत 

पूजा -घर में मूरती ,मीरा के संग श्याम 
जितनी जिसकी चाकरी ,उतने उसके दाम 

सीता -रावण ,राम का ,करें बिभाजन लोग 
एक ही तन में देखिए ,तीनों का संजोग 

माटी से माटी मिले ,खो के सभी निशान 
किसमें कितना कौन है ,कैसे हो पहचान 

सात समुन्दर पार से कोई करे व्यापार 
पहले भेजे सरहदें ,फिर भेजे हथियार 

चाकू काटे बांस को ,बंसी खोले भेद 
उतने ही सुर जानिए ,जितने उसमें छेद 

बच्चा बोला देखकर ,मस्जिद आलीशान 
अल्ला तेरे एक को ,इतना बड़ा मकान 

जादू टोना रोज़ का ,बच्चों का व्यवहार 
छोटी सी एक गेंद में भर दें सब संसार 

मैं रोया परदेश में ,भींगा माँ का प्यार 
दुःख ने दुःख से बात की ,बिन चिट्ठी बिन तार 

सातो दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर 
जिस दिन सोये देर तक भूखा रहे फ़कीर 

सीधा -सादा डाकिया जादू करे महान 
एक ही थैले में भरे ,आँसू और मुस्कान

Saturday, 17 December 2011


 इतना क्यों बेकल है भाई
हर मुश्किल का हल है भाई

सूखा नहीं अभी भी सारा
कुछ आँखों में जल है भाई

आँख भले ही टिकी गगन पर
पैरों नीचे थल है भाई

यहाँ ठोस ही जी पाऐगा
जीवन भले तरल है भाई

कहाँ सूद की बात करें अब
डूबा हुआ असल है भाई

वही जटिल होता है सबसे
कहना जिसे सरल है भाई

आप भले ही ना माने पर
हमने कही ग़ज़ल है भाई