Sunday, 9 November 2014

टी0 वी0 से अख़बार तक ग़र सेक्स की बौछार हो

टी0 वी0 से अख़बार तक ग़र सेक्स की बौछार हो फिर बताओ कैसे अपनी सोच का विस्तार हो बह गए कितने सिकन्दर वक्त के सैलाब में अक्ल इस कच्चे घड़े से कैसे दरिया पार हो सभ्यता ने मौत से डरकर उठाए हैं क़दम ताज़ की कारीगरी या चीन की दीवार हो मेरी खुद्दारी ने अपना सर झुकाया दो जगह वो कोई मजलूम हो या साहिबे किरदार हो एक सपना है जिसे साकार करना है तुम्हें झोपड़ी से राजपथ का रास्ता हमवार हो

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