वो मेरा अपना था यूँ तो
फिर भी इक सपना था यूँ तो
सारी बातें नजरों ने की
मुँह से भी कहना था यूँ तो
उनका घर गैरों का कब्जा
दोनों को रहना था यूँ तो
उसने सब कुछ दिखला डाला कुछ ना कुछ पहना था यूँ तो
रंजिश थी पर सबके आगे
अपनापन लगना था यूँ तो
तन का इक इक तार बिखेरा रिश्ता भी बुनना था यूँ तो
सहरा में छालों से पानी
बादल से मिलना था यूँ तो ।
फिर भी इक सपना था यूँ तो
सारी बातें नजरों ने की
मुँह से भी कहना था यूँ तो
उनका घर गैरों का कब्जा
दोनों को रहना था यूँ तो
उसने सब कुछ दिखला डाला कुछ ना कुछ पहना था यूँ तो
रंजिश थी पर सबके आगे
अपनापन लगना था यूँ तो
तन का इक इक तार बिखेरा रिश्ता भी बुनना था यूँ तो
सहरा में छालों से पानी
बादल से मिलना था यूँ तो ।
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