Saturday, 1 October 2011

कितना हालात ने लाचार किया है मुझको,
पोंछ सकता नहीं आँखों से तुम्हारे आंसू.
मैं यह सह लेता,अगर हाथ किसी का बढ़ता,
देख सकता नहीं दिन रात ये बहते आंसू.


गर मिला होता कोई कांधा तुम्हें रोने को,
फेर कर नज़रें, मैं हट जाता तेरी राहों से.
होता बस में मेरे, दे देता उजाले अपने,
सर्द रातों को तपा देता,  मेरी साँसों से.


अब न रिश्ता, न कोई हक़ है करीब आने का,

सिर्फ अहसास का अनजान सा है एक नाता.
ज़िस्म के रिश्ते छुपे रहते हैं चादर में यहाँ,
सिर्फ ज़ज्बात का रिश्ता ही है पत्थर खाता.


कह  नहीं सकता कि अब आओ कहीं दूर चलें,
जब ज़मीं अपनी नहीं, आसमां क्यों कर होगा.
बंद खिड़की ये करो, हसरतें जगती  दिल में,
खुश्क हैं आँख, मगर दिल भी न क्या तर होगा.

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