टी0 वी0 से अख़बार तक ग़र सेक्स की बौछार हो फिर बताओ कैसे अपनी सोच का विस्तार हो बह गए कितने सिकन्दर वक्त के सैलाब में अक्ल इस कच्चे घड़े से कैसे दरिया पार हो सभ्यता ने मौत से डरकर उठाए हैं क़दम ताज़ की कारीगरी या चीन की दीवार हो मेरी खुद्दारी ने अपना सर झुकाया दो जगह वो कोई मजलूम हो या साहिबे किरदार हो एक सपना है जिसे साकार करना है तुम्हें झोपड़ी से राजपथ का रास्ता हमवार हो
Sunday, 9 November 2014
मै बेवफा हु उसने ये तो बता दिया,
मै बेवफा हु उसने ये तो बता दिया,पर मेरी वफाओ का उसने क्या सिला दिया,
वादा करके जिंदगी भर के साथ का,नये दोस्त बना के मुझको भुला दिया,
मुझे काफ़िर बता के गैरों संग मुस्कुराए,गलती हमारी नाखुदा को खुदा बना दिया,
चलो माना मै कभी तेरे काबिल ही नही था,ये जानते हुए भी साथ तुमने सालो बिता दिया,
मै जज्बातो के शतरंज का खिलाड़ी सनम,तुझमे कुछ तो बात थी जो मुझको रुला दिया ....गौरव
तेरा सपना क्यों पूरा नहीं होता
तेरा सपना क्यों पूरा नहीं होता…..
हिम्मत वालो का इरादा अधुरा नहीं होता,
जिस इंसान के कर्म अच्छे होते है
उस के जीवन में कभी अँधेरा नहीं होता..!!
हिम्मत वालो का इरादा अधुरा नहीं होता,
जिस इंसान के कर्म अच्छे होते है
उस के जीवन में कभी अँधेरा नहीं होता..!!
Sunday, 6 July 2014
शेर जो गजल न बन सके - जिन्दगी
कुछ दूर यूंही चल कर अक्सर ठहर जाती है जिन्दगी
फ़िर हर इक याद रुक रुक कर दोहराती है जिन्दगी
पहले तो ढूंढती है अपने यह लिये खुद इक मुकाम
और फ़िर खुद ही इक तलाश बन जाती है जिन्दगी
*********************************************
कांच से रिश्ते संभालने में बिताई है जिन्दगी
फ़िर आज क्यूं हमसे हुई परायी है जिन्दगी
ख्वाबों के शहर छोड कर हम हैं दूर आ गये
हालात की आंधी में रेत सी उडाई है जिन्दगी
**********************************************
यूं जीने का नाम जिन्दगी है सोचा न था कभी
बस रोने का नाम जिन्दगी है सोचा न था कभी
वफ़ा के नाम पर वो सिर्फ़ इक दाग दे गया
उदास सुबह शाम जिन्दगी है सोचा न था कभी
********************************************
हर पल कुछ नया रूप दिखलाती है जिन्दगी
कभी धूप कभी चांदनी में चलाती है जिन्दगी
कभी मखमल बन तलबे सहलाती है जिन्दगी
कभी खार बन गहरे तक गढ जाती है जिन्दगी
*********************************************
फ़िर हर इक याद रुक रुक कर दोहराती है जिन्दगी
पहले तो ढूंढती है अपने यह लिये खुद इक मुकाम
और फ़िर खुद ही इक तलाश बन जाती है जिन्दगी
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कांच से रिश्ते संभालने में बिताई है जिन्दगी
फ़िर आज क्यूं हमसे हुई परायी है जिन्दगी
ख्वाबों के शहर छोड कर हम हैं दूर आ गये
हालात की आंधी में रेत सी उडाई है जिन्दगी
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यूं जीने का नाम जिन्दगी है सोचा न था कभी
बस रोने का नाम जिन्दगी है सोचा न था कभी
वफ़ा के नाम पर वो सिर्फ़ इक दाग दे गया
उदास सुबह शाम जिन्दगी है सोचा न था कभी
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हर पल कुछ नया रूप दिखलाती है जिन्दगी
कभी धूप कभी चांदनी में चलाती है जिन्दगी
कभी मखमल बन तलबे सहलाती है जिन्दगी
कभी खार बन गहरे तक गढ जाती है जिन्दगी
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copied from mohinder kumar's blog <dil ka darpan>
Wednesday, 23 May 2012
dohe nida fazali ke
सबकी पूजा एक सी ,अलग -अलग हर रीत
मस्जिद जाए मौलवी ,कोयल गाए गीत
पूजा -घर में मूरती ,मीरा के संग श्याम
जितनी जिसकी चाकरी ,उतने उसके दाम
सीता -रावण ,राम का ,करें बिभाजन लोग
एक ही तन में देखिए ,तीनों का संजोग
माटी से माटी मिले ,खो के सभी निशान
किसमें कितना कौन है ,कैसे हो पहचान
सात समुन्दर पार से कोई करे व्यापार
पहले भेजे सरहदें ,फिर भेजे हथियार
चाकू काटे बांस को ,बंसी खोले भेद
उतने ही सुर जानिए ,जितने उसमें छेद
बच्चा बोला देखकर ,मस्जिद आलीशान
अल्ला तेरे एक को ,इतना बड़ा मकान
जादू टोना रोज़ का ,बच्चों का व्यवहार
छोटी सी एक गेंद में भर दें सब संसार
मैं रोया परदेश में ,भींगा माँ का प्यार
दुःख ने दुःख से बात की ,बिन चिट्ठी बिन तार
सातो दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर
जिस दिन सोये देर तक भूखा रहे फ़कीर
सीधा -सादा डाकिया जादू करे महान
एक ही थैले में भरे ,आँसू और मुस्कान
Saturday, 17 December 2011
इतना क्यों बेकल है भाई
हर मुश्किल का हल है भाई
सूखा नहीं अभी भी सारा
कुछ आँखों में जल है भाई
आँख भले ही टिकी गगन पर
पैरों नीचे थल है भाई
यहाँ ठोस ही जी पाऐगा
जीवन भले तरल है भाई
कहाँ सूद की बात करें अब
डूबा हुआ असल है भाई
वही जटिल होता है सबसे
कहना जिसे सरल है भाई
आप भले ही ना माने पर
हमने कही ग़ज़ल है भाई
Wednesday, 7 December 2011
मेरे लहू की आग
सारे जग की प्यास बुझाना, इतना आसाँ काम है क्या?
पानी को भी भाप में ढलकर बादल बनना पड़ता है
जलते दिए की लौ ही जाने उसकी आँखें जानें क्या?
कैसी कैसी झेल के बिपता , काजल बनना पड़ता है
'मीर' कोई था 'मीरा' कोई, लेकिन उनकी बात अलग
इश्क न करना, इश्क में प्यारे पागल बनना पड़ता है
'निश्तर' साहब! हमसे पूछो, हमने जर्बें झेली हैं
घायल मन की पीड़ समझने घायल बनना पड़ता है
ज़र्बें :चोटें
Sunday, 9 October 2011
आख़िरी कोशिश भी कर के देखते
फिर उसी दर से गुज़र के देखते
गुफ़्तगू का कोई तो मिलता सिरा
फिर उसे नाराज़ कर के देखते
काश जुड़ जाता वो टूटा आईना
हम भी कुछ दिन बन संवर के देखते
रास्ते को ही ठिकाना कर लिया
कब तलक हम ख़्वाब घर के देखते
काश मिल जाता कहीं साहिल कोई
हम भी कश्ती से उतर के देखते
हो गया तारी संवरने का नशा
वरना ख्वाहिश थी बिखर के देखते
दर्द ही गर हासिल ए हस्ती है तो
दर्द की हद से गुज़र के देखते
फिर उसी दर से गुज़र के देखते
गुफ़्तगू का कोई तो मिलता सिरा
फिर उसे नाराज़ कर के देखते
काश जुड़ जाता वो टूटा आईना
हम भी कुछ दिन बन संवर के देखते
रास्ते को ही ठिकाना कर लिया
कब तलक हम ख़्वाब घर के देखते
काश मिल जाता कहीं साहिल कोई
हम भी कश्ती से उतर के देखते
हो गया तारी संवरने का नशा
वरना ख्वाहिश थी बिखर के देखते
दर्द ही गर हासिल ए हस्ती है तो
दर्द की हद से गुज़र के देखते
Monday, 3 October 2011
प्रेम काव्य - पर मैंने इसको, गीता ओ कुरान कहा है
प्रेम को किसी ने, भगवान कहा है,
और किसी ने इसे रब का, वरदान कहा है,
तुने इसे क्या समझा, नही जानता हूँ मैं,
मैंने इसे ईश्वरीय, तोहफा महान कहा है...........
किसी ने इसको, शीरी फरहाद है माना,
किसी ने इसको, लैला और मजनू मै जाना,
जिसने इसे जिस रूप मैं, देखा हुआ वैसा,
मैंने तो इसको अपना, हिंदुस्तान कहा है .............
किसी ने इसको कहा, राधा की भक्ति,
किसी ने माना इसे, सावित्री की शक्ति,
कुछ को लगे ये, जीसस और मदर टेरेसा,
पर मैंने इसको, गीता ओ कुरान कहा है .............
कुछ मर मिटे गोरी गोरी, चमड़ी देख के,
कुछ ने प्यार किया, बेपनाह दमड़ी देख के,
कुछ की नजर में प्यार है, बस पाना ही पाना,
मैंने तो इसको, त्याग और बलिदान कहा है ........
कुछ ने इसको चाहा, तलवार से पाना,
कुछ किये इसके लिए, तमाम साजिस ए जमाना,
पर प्यार है पूजा, इबादत मेरे साथी,
मैंने तो इसको, धर्म ओ ईमान कहा है ........
और किसी ने इसे रब का, वरदान कहा है,
तुने इसे क्या समझा, नही जानता हूँ मैं,
मैंने इसे ईश्वरीय, तोहफा महान कहा है...........
किसी ने इसको, शीरी फरहाद है माना,
किसी ने इसको, लैला और मजनू मै जाना,
जिसने इसे जिस रूप मैं, देखा हुआ वैसा,
मैंने तो इसको अपना, हिंदुस्तान कहा है .............
किसी ने इसको कहा, राधा की भक्ति,
किसी ने माना इसे, सावित्री की शक्ति,
कुछ को लगे ये, जीसस और मदर टेरेसा,
पर मैंने इसको, गीता ओ कुरान कहा है .............
कुछ मर मिटे गोरी गोरी, चमड़ी देख के,
कुछ ने प्यार किया, बेपनाह दमड़ी देख के,
कुछ की नजर में प्यार है, बस पाना ही पाना,
मैंने तो इसको, त्याग और बलिदान कहा है ........
कुछ ने इसको चाहा, तलवार से पाना,
कुछ किये इसके लिए, तमाम साजिस ए जमाना,
पर प्यार है पूजा, इबादत मेरे साथी,
मैंने तो इसको, धर्म ओ ईमान कहा है ........
.....बहुत दिन बीते.......
थाली मैं दाल को आये हुए,
पत्नी को हरी सब्जी बनाये हुए,
खाने मै सलाद को खाए हुए,
......बहुत दिन बीते.......
रोटी का साथ देखो मक्खन ने छोड़ा,
दूध की खातिर बिटिया का दिल तोडा,
रोटी पे मक्खन लगाये हुए,
बिटिया को दूध पिलाये हुए,
साथ मैं बिस्कुट खिलाये हुए,
......बहुत दिन बीते.......
बच्चों को दिलाने गये जो कपड़े,
महगाई ने हाथ दोनों ही पकड़े,
प्रेरणा को फ्राक दिलाये हुए,
पारस को अचकन सिलाये हुए,
नंगे पैरों को जूते पहनाये हुए,
......बहुत दिन बीते.......
दोस्तों को हमसे शिकायत ये आम है,
मिलते नही प्यारे क्या इतना काम है,
दोस्तों को घर पर बुलाये हुए,
दोस्तों के घर खुद भी जाये हुए,
मिल जुल के पार्टी मनाये हुए,
......बहुत दिन बीते.......
त्योहारों की रंगत अब हो गई फीकी,
महगाई से हमने बात ये है सीखी,
ईद की सिवैयां खाए हुए,
दिवाली की मिठाई भिजवाये हुए,
किरिश्मश पे गिफ्ट दिलाये हुए,
.....बहुत दिन बीते.......
मैं जब तक नेताओं की बात नही कर लेता मेरे पेट का दर्द ठीक नही होता है (
ऐसा नही की सारे नेता ही खराब हैं मगर बहुतायत तो भ्रष्ट व अपराधिक टाइप के
नेताओं का ही है ) सो उन भ्रष्ट नेताओं के लिए कुछ पंक्तियाँ..........
हम करते हैं जब भी दिखावा ही करते,
देश की हालत से फर्क हमको नही पड़ते,
गणतन्त्र दिल से मनाये हुए,
राष्ट्र गान वास्तव मैं गाये हुए,
दिल से तिरंगा फहराए हुए,
......बहुत दिन बीते.......
पत्नी को हरी सब्जी बनाये हुए,
खाने मै सलाद को खाए हुए,
......बहुत दिन बीते.......
रोटी का साथ देखो मक्खन ने छोड़ा,
दूध की खातिर बिटिया का दिल तोडा,
रोटी पे मक्खन लगाये हुए,
बिटिया को दूध पिलाये हुए,
साथ मैं बिस्कुट खिलाये हुए,
......बहुत दिन बीते.......
बच्चों को दिलाने गये जो कपड़े,
महगाई ने हाथ दोनों ही पकड़े,
प्रेरणा को फ्राक दिलाये हुए,
पारस को अचकन सिलाये हुए,
नंगे पैरों को जूते पहनाये हुए,
......बहुत दिन बीते.......
दोस्तों को हमसे शिकायत ये आम है,
मिलते नही प्यारे क्या इतना काम है,
दोस्तों को घर पर बुलाये हुए,
दोस्तों के घर खुद भी जाये हुए,
मिल जुल के पार्टी मनाये हुए,
......बहुत दिन बीते.......
त्योहारों की रंगत अब हो गई फीकी,
महगाई से हमने बात ये है सीखी,
ईद की सिवैयां खाए हुए,
दिवाली की मिठाई भिजवाये हुए,
किरिश्मश पे गिफ्ट दिलाये हुए,
.....बहुत दिन बीते.......
मैं जब तक नेताओं की बात नही कर लेता मेरे पेट का दर्द ठीक नही होता है (
ऐसा नही की सारे नेता ही खराब हैं मगर बहुतायत तो भ्रष्ट व अपराधिक टाइप के
नेताओं का ही है ) सो उन भ्रष्ट नेताओं के लिए कुछ पंक्तियाँ..........
हम करते हैं जब भी दिखावा ही करते,
देश की हालत से फर्क हमको नही पड़ते,
गणतन्त्र दिल से मनाये हुए,
राष्ट्र गान वास्तव मैं गाये हुए,
दिल से तिरंगा फहराए हुए,
......बहुत दिन बीते.......
तड़प से जाते हैं हम, रूठ कर यूँ जाया न करो
ऐ सितमगर रोते हुओं को और रुलाया न करो
जाना हीं हो तुम्हे, तो जाओ कुछ इस तरह
ले जाओ निशानियाँ, यादों में भी आया न करो
हमे सुनाकर बेवफाइयों के किस्से बार बार
हमारे सब्र की इन्तेहाँ को आजमाया न करो
न आता हो तुम्हे निभाना, तो रिश्ते बनाकर
कसमों वादों में किसी को उलझाया न करो
हँसा कर एक बार यूँ बार बार रुला देते हों हमें
अब रहने दो तन्हा, महफ़िलों में बुलाया न करो
ऐ सितमगर रोते हुओं को और रुलाया न करो
जाना हीं हो तुम्हे, तो जाओ कुछ इस तरह
ले जाओ निशानियाँ, यादों में भी आया न करो
हमे सुनाकर बेवफाइयों के किस्से बार बार
हमारे सब्र की इन्तेहाँ को आजमाया न करो
न आता हो तुम्हे निभाना, तो रिश्ते बनाकर
कसमों वादों में किसी को उलझाया न करो
हँसा कर एक बार यूँ बार बार रुला देते हों हमें
अब रहने दो तन्हा, महफ़िलों में बुलाया न करो
Saturday, 1 October 2011
कितना हालात ने लाचार किया है मुझको,
पोंछ सकता नहीं आँखों से तुम्हारे आंसू.
मैं यह सह लेता,अगर हाथ किसी का बढ़ता,
देख सकता नहीं दिन रात ये बहते आंसू.
गर मिला होता कोई कांधा तुम्हें रोने को,
फेर कर नज़रें, मैं हट जाता तेरी राहों से.
होता बस में मेरे, दे देता उजाले अपने,
सर्द रातों को तपा देता, मेरी साँसों से.
अब न रिश्ता, न कोई हक़ है करीब आने का,
सिर्फ अहसास का अनजान सा है एक नाता.
ज़िस्म के रिश्ते छुपे रहते हैं चादर में यहाँ,
सिर्फ ज़ज्बात का रिश्ता ही है पत्थर खाता.
कह नहीं सकता कि अब आओ कहीं दूर चलें,
जब ज़मीं अपनी नहीं, आसमां क्यों कर होगा.
बंद खिड़की ये करो, हसरतें जगती दिल में,
खुश्क हैं आँख, मगर दिल भी न क्या तर होगा.
पोंछ सकता नहीं आँखों से तुम्हारे आंसू.
मैं यह सह लेता,अगर हाथ किसी का बढ़ता,
देख सकता नहीं दिन रात ये बहते आंसू.
गर मिला होता कोई कांधा तुम्हें रोने को,
फेर कर नज़रें, मैं हट जाता तेरी राहों से.
होता बस में मेरे, दे देता उजाले अपने,
सर्द रातों को तपा देता, मेरी साँसों से.
अब न रिश्ता, न कोई हक़ है करीब आने का,
सिर्फ अहसास का अनजान सा है एक नाता.
ज़िस्म के रिश्ते छुपे रहते हैं चादर में यहाँ,
सिर्फ ज़ज्बात का रिश्ता ही है पत्थर खाता.
कह नहीं सकता कि अब आओ कहीं दूर चलें,
जब ज़मीं अपनी नहीं, आसमां क्यों कर होगा.
बंद खिड़की ये करो, हसरतें जगती दिल में,
खुश्क हैं आँख, मगर दिल भी न क्या तर होगा.
Monday, 26 September 2011
देवता हमें पुकारेंगे..''
''जब पाप या प्रेम करने की बची न होगी शक्ति,
जब एक लहूलुहान भाषा और जर्जर शरीर भर होंगे पास,
जब शब्द उड़ रहे होंगे चिंदियों की तरह हवा में
तब किसी पुराने छज्जे से
स्वप्न की किसी ऊंची चट्टान से
सदियों से बंद किसी खिड़की से
देवता हमें पुकारेंगे..''
जब एक लहूलुहान भाषा और जर्जर शरीर भर होंगे पास,
जब शब्द उड़ रहे होंगे चिंदियों की तरह हवा में
तब किसी पुराने छज्जे से
स्वप्न की किसी ऊंची चट्टान से
सदियों से बंद किसी खिड़की से
देवता हमें पुकारेंगे..''
Thursday, 22 September 2011
हुक्म चलता है तेरा तेरी ही सरदारी है
हुक्म चलता है तेरा तेरी ही सरदारी है
तू है पैसा, तू ख़ुदा, तेरी वफ़ादारी है।
नंगापन भी तो यहाँ फ़न की तरह बिकता है
अब तो जिस्मों की नुमाईश ही अदाकारी है।
कट गया दिन तो मेरा भीड़ में जैसे-तैसे
लेकिन अब चाँद बिना रात बहुत भारी है।
गौर से देख जरा बीज से अंकुर फ़ूटा
ये ख़ुदा है ये उसी की ही ख़लक सारी है।
छोड़ दो जिद न करो हार चुके हो अब तुम
अब कोई दांव न खेलो तो समझदारी है।
Monday, 19 September 2011
BAAT PHOOLO'N KI
Phir Chhidi Raat Baat Phoolo'n Ki
raat hai yaa baaraat phoolo'n kii
phool ke hai.n phool ke gajare
raat hai yaa baaraat phoolo'n kii
phool ke hai.n phool ke gajare
shaam phoolo'n kii, raat phoolo'n kii
aapkaa saath-saath phoolo'n kaa
aapkii baat baat phoolo'n kii
phl khilate rahe'nge duniyaa mein
roz nikalegii baat phoolo'n kii
nazare.n milatii hai.n jaam milate hai.n
mil rahii hai hayaat phuulo.n kii
ye mahakatii huii Gazal maKaduu.n
jaise saharaa me.n raat phuulo.n kii
aapkii baat baat phoolo'n kii
phl khilate rahe'nge duniyaa mein
roz nikalegii baat phoolo'n kii
nazare.n milatii hai.n jaam milate hai.n
mil rahii hai hayaat phuulo.n kii
ye mahakatii huii Gazal maKaduu.n
jaise saharaa me.n raat phuulo.n kii
घूरता कया है कमीने कुत्ते
सुंघता कया है कमीने कुत्ते.
चांदनी ओढ् सो गई बस्ती
जागता कया है कमीने कुत्ते.
शबकी खामोशी सुन सके सुन
भुंकता कया है कमीने कुत्ते.
ये तो तेरी ही अपनी हड्डी है
चातटा कया है कमीने कुत्ते.
गेर अक़स आईने में कहां
नौचता कया है कमीने कुत्ते.
तेरे सायेका तुझ पे पांव पडा
काटता कया है कमीने कुत्ते.
तेरी मंझील हनोझ कोसों दूर
हांपता कया है कमीने कुत्ते.
सामना कर तमाम दुनिया का
भाकता कया है कमीने कुत्ते.
सोचने का कोइ इलाज नहीं
सोचता कया है कमीने कुत्ते.
देख सारी खुदाई जाग उठी
उंघता कया है कमीने कुत्ते.
वो मेरा अपना था यूँ तो
फिर भी इक सपना था यूँ तो
सारी बातें नजरों ने की
मुँह से भी कहना था यूँ तो
उनका घर गैरों का कब्जा
दोनों को रहना था यूँ तो
उसने सब कुछ दिखला डाला कुछ ना कुछ पहना था यूँ तो
रंजिश थी पर सबके आगे
अपनापन लगना था यूँ तो
तन का इक इक तार बिखेरा रिश्ता भी बुनना था यूँ तो
सहरा में छालों से पानी
बादल से मिलना था यूँ तो ।
फिर भी इक सपना था यूँ तो
सारी बातें नजरों ने की
मुँह से भी कहना था यूँ तो
उनका घर गैरों का कब्जा
दोनों को रहना था यूँ तो
उसने सब कुछ दिखला डाला कुछ ना कुछ पहना था यूँ तो
रंजिश थी पर सबके आगे
अपनापन लगना था यूँ तो
तन का इक इक तार बिखेरा रिश्ता भी बुनना था यूँ तो
सहरा में छालों से पानी
बादल से मिलना था यूँ तो ।
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